विवेकानन्द अभिलेखागार

पत्र

विवेकानन्द का व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार सार्वजनिक वक्ता के पीछे के मन में एक अन्तरंग झलक प्रदान करता है — उनके सन्देह, उनकी हास्य-वृत्ति, अपने गुरु श्रीरामकृष्ण के प्रति उनकी उत्कट भक्ति, और भारत के उत्थान के लिए उनकी अथक योजनाएँ प्रकट करता है। शिष्यों, सन्यासी-बन्धुओं और विभिन्न महाद्वीपों के मित्रों को लिखे ये पत्र उनके प्रारम्भिक परिव्राजक-काल से लेकर पश्चिम में विजय और रामकृष्ण संघ की स्थापना तक उनके अभियान की रेखा खींचते हैं। ये उनकी विरासत के सर्वाधिक प्रिय दस्तावेज़ बने हुए हैं, जो एक अत्यन्त स्पष्टवादी स्वर में आध्यात्मिक मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रज्ञा का संयोजन करते हैं।

पत्र पर प्रमुख उद्धरण

“I do not know why I should be undeservingly praised”

— Volume 5, II Panditji Maharaj

“There is an almost perpendicular tramway going to the top of the hill, dragged by wire-rope and steam-power”

— Volume 5, III Alasinga

“Know, then, that this is the land of Christians, and any other influence than that is almost zero”

— Volume 5, IV Alasinga


पत्र पर रचनाएँ

इस विषय पर 17 में से 12 रचनाएँ प्रदर्शित


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