पत्र
विवेकानन्द का व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार सार्वजनिक वक्ता के पीछे के मन में एक अन्तरंग झलक प्रदान करता है — उनके सन्देह, उनकी हास्य-वृत्ति, अपने गुरु श्रीरामकृष्ण के प्रति उनकी उत्कट भक्ति, और भारत के उत्थान के लिए उनकी अथक योजनाएँ प्रकट करता है। शिष्यों, सन्यासी-बन्धुओं और विभिन्न महाद्वीपों के मित्रों को लिखे ये पत्र उनके प्रारम्भिक परिव्राजक-काल से लेकर पश्चिम में विजय और रामकृष्ण संघ की स्थापना तक उनके अभियान की रेखा खींचते हैं। ये उनकी विरासत के सर्वाधिक प्रिय दस्तावेज़ बने हुए हैं, जो एक अत्यन्त स्पष्टवादी स्वर में आध्यात्मिक मार्गदर्शन और व्यावहारिक प्रज्ञा का संयोजन करते हैं।
पत्र पर प्रमुख उद्धरण
“I do not know why I should be undeservingly praised”
— Volume 5, II Panditji Maharaj
“There is an almost perpendicular tramway going to the top of the hill, dragged by wire-rope and steam-power”
— Volume 5, III Alasinga
“Know, then, that this is the land of Christians, and any other influence than that is almost zero”
— Volume 5, IV Alasinga
पत्र पर रचनाएँ
I फकीर
Epistles - First Series
179 शब्द
1 मिनट पठन
II पण्डितजी महाराज
Epistles - First Series
535 शब्द
2 मिनट पठन
III अलासिंगा
Epistles - First Series
1,880 शब्द
8 मिनट पठन
IV अलासिंगा
Epistles - First Series
2,958 शब्द
12 मिनट पठन
टिप्पणी
Epistles - First Series
47 शब्द
1 मिनट पठन
I श्रीमान
Epistles - Second Series
99 शब्द
1 मिनट पठन
II श्रीमान
Epistles - Second Series
119 शब्द
1 मिनट पठन
III श्रीमान
Epistles - Second Series
409 शब्द
2 मिनट पठन
I श्रीमान
Epistles - Third Series
533 शब्द
2 मिनट पठन
II श्रीमान
Epistles - Third Series
140 शब्द
1 मिनट पठन
टिप्पणी
Epistles - Third Series
47 शब्द
1 मिनट पठन
I श्रीमान
Epistles - Fourth Series
73 शब्द
1 मिनट पठन
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