भक्तियोग
विवेकानन्द ने भक्तियोग को दिव्य प्रेम का मार्ग बताया, जहाँ साधक ईश्वर के साथ एक तीव्र, व्यक्तिगत सम्बन्ध विकसित करता है जो समस्त कर्मकाण्ड और हठधर्मिता से परे है। उन्होंने सिखाया कि सच्ची भक्ति भय या पुरस्कार की कामना से नहीं जन्मती, बल्कि आत्मा की अपने उद्गम से पुनर्मिलन की सहज अभीप्सा से उत्पन्न होती है, जो पराभक्ति — उस परम प्रेम में पराकाष्ठा को प्राप्त होती है जो समस्त प्राणियों में ईश्वर के दर्शन करता है। नारद भक्ति सूत्र और महान रहस्यवादियों के जीवन का आधार लेकर उन्होंने दिखाया कि भक्ति चारों योगों में सबसे सरल और सबसे स्वाभाविक है।
भक्तियोग पर प्रमुख उद्धरण
“The idea of a Personal God has obtained in almost every religion, except a very few”
— Volume 2, Bhakti or Devotion
“Weakness has got to go before a man dares to become a Vedantist, and we know how difficult that is”
— Volume 3, Bhakti
“CHAPTER X CONCLUSION When this highest ideal of love is reached, philosophy is thrown away; who will then care for it”
— Volume 3, Conclusion
भक्तियोग पर रचनाएँ
भक्ति अथवा श्रद्धा
Bhakti or Devotion
5,795 शब्द
23 मिनट पठन
भक्ति
Lectures from Colombo to Almora
2,795 शब्द
11 मिनट पठन
उपसंहार
Para-Bhakti or Supreme Devotion
560 शब्द
2 मिनट पठन
भक्ति की परिभाषा
Bhakti-Yoga
1,895 शब्द
8 मिनट पठन
दिव्य प्रेम के आदर्श की मानवीय अभिव्यक्तियाँ
Para-Bhakti or Supreme Devotion
2,316 शब्द
9 मिनट पठन
अवतारी गुरु और अवतार
Bhakti-Yoga
1,076 शब्द
4 मिनट पठन
साधक और गुरु की योग्यताएँ
Bhakti-Yoga
1,796 शब्द
7 मिनट पठन
आध्यात्मिक साक्षात्कार, भक्तियोग का उद्देश्य
Bhakti-Yoga
782 शब्द
3 मिनट पठन
भक्त का त्याग प्रेम से उत्पन्न होता है
Para-Bhakti or Supreme Devotion
1,358 शब्द
5 मिनट पठन
इष्ट देवता
Bhakti-Yoga
914 शब्द
4 मिनट पठन
प्रेम के रूप — अभिव्यक्ति
Para-Bhakti or Supreme Devotion
658 शब्द
3 मिनट पठन
प्रेम के ईश्वर स्वयं अपना प्रमाण हैं
Para-Bhakti or Supreme Devotion
744 शब्द
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इस विषय पर 34 में से 12 रचनाएँ प्रदर्शित