विवेकानन्द अभिलेखागार
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भक्तियोग, पराभक्ति, कोलम्बो से अल्मोड़ा तक के व्याख्यान

69 अध्याय · 182,960 शब्द

स्वामी विवेकानन्द के समग्र वाङ्मय का तृतीय खंड — भक्तियोग, पराभक्ति, कोलम्बो से अल्मोड़ा तक के व्याख्यान।

ऐतिहासिक सन्दर्भ

तृतीय खंड में ऐतिहासिक "कोलम्बो से अल्मोड़ा तक के व्याख्यान" संकलित हैं जो विवेकानन्द की जनवरी-फरवरी १८९७ में भारत-विजय-यात्रा के अवसर पर दिए गए थे, जब पाश्चात्य सफलता के पश्चात् उनका राष्ट्रीय नायक के रूप में स्वागत हुआ। इसमें भक्तियोग और पराभक्ति (परम प्रेम) पर उनके ग्रन्थ तथा उनका विद्वत्तापूर्ण निबन्ध "बौद्ध भारत" भी सम्मिलित है, जो भारत के धार्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास के प्रति उनकी गहन संलग्नता को प्रतिबिम्बित करता है।


विषय-सूची

1

रामेश्वरम् मन्दिर में सच्ची उपासना पर भाषण

Lectures from Colombo to Almora

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2

अल्मोड़ा में स्वागत भाषण और उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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3

कलकत्ता में प्रस्तुत स्वागत भाषण और उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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4

एक रोचक व्याख्यान

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5

धर्म संसद में

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6

भक्ति

Lectures from Colombo to Almora

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7

बौद्ध भारत

Buddhistic India

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8

उपसंहार

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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9

भक्ति की परिभाषा

Bhakti-Yoga

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10

पूर्व में प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान (कोलम्बो)

Lectures from Colombo to Almora

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11

हिन्दू दर्शन

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12

हिन्दू सभ्यता

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13

मेले में हिन्दू

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14

दिव्य प्रेम के आदर्श की मानवीय अभिव्यक्तियाँ

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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15

अवतारी गुरु और अवतार

Bhakti-Yoga

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16

भारत: उसका धर्म और रीति-रिवाज

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17

भारत में शिष्टाचार और रीति-रिवाज

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18

चमत्कार

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19

मेरी कार्ययोजना

Lectures from Colombo to Almora

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20

दान पर

Lectures from Colombo to Almora

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21

एक सत्ता का अनेक रूपों में प्रकट होना

Lectures and Discourses

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22

व्यक्तिगत विशेषताएँ

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23

सहिष्णुता की अपील

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24

साधक और गुरु की योग्यताएँ

Bhakti-Yoga

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25

पुनर्जन्म

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26

मद्रास में स्वागत भाषण का उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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27

मदुरा में स्वागत भाषण का उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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28

पाम्बन में स्वागत भाषण का उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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29

परमकुडि में स्वागत भाषण का उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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30

रामनाड में स्वागत भाषण का उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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31

शिवगंगा और मानामदुरा में स्वागत भाषण का उत्तर

Lectures from Colombo to Almora

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32

संन्यास: इसका आदर्श और अभ्यास

Lectures from Colombo to Almora

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33

आध्यात्मिक साक्षात्कार, भक्तियोग का उद्देश्य

Bhakti-Yoga

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34

भक्त का त्याग प्रेम से उत्पन्न होता है

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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35

इष्ट देवता

Bhakti-Yoga

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36

हिन्दू धर्म की सामान्य आधारशिलाएँ

Lectures from Colombo to Almora

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37

मनुष्य की दिव्यता

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38

प्रेम के रूप — अभिव्यक्ति

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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39

मुक्त आत्मा

Lectures and Discourses

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40

भारत का भविष्य

Lectures from Colombo to Almora

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41

प्रेम के ईश्वर स्वयं अपना प्रमाण हैं

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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42

सच्चे प्रेमी के लिए पराज्ञान और पराभक्ति एक हैं

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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43

हिन्दू संन्यासी

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44

हिन्दू धर्म (हिन्दू रिलिजन)

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45

इंग्लैण्ड में भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन का प्रभाव

Lectures from Colombo to Almora

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46

ईश्वर-प्रेम

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47

मन्त्र: ॐ: शब्द और ज्ञान

Bhakti-Yoga

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48

विधि और साधन

Bhakti-Yoga

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49

वेदान्त का ध्येय

Lectures from Colombo to Almora

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50

भक्तियोग की स्वाभाविकता और उसका केन्द्रीय रहस्य

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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51

गुरु की आवश्यकता

Bhakti-Yoga

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52

ईश्वर का दर्शन

Bhakti-Yoga

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53

प्रारम्भिक त्याग

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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54

जिस धर्म में हम जन्मे हैं

Lectures from Colombo to Almora

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55

भारत के ऋषि

Lectures from Colombo to Almora

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56

प्रेम का त्रिकोण

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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57

वेदान्त

Lectures from Colombo to Almora

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58

वेदान्त अपने समस्त पहलुओं में

Lectures from Colombo to Almora

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59

भारत की नारियाँ

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60

हमारे समक्ष कार्य

Lectures from Colombo to Almora

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61

एकता, धर्म का लक्ष्य

Lectures and Discourses

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62

विश्वप्रेम और कैसे यह आत्मसमर्पण की ओर ले जाता है

Para-Bhakti or Supreme Devotion

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63

भारतीय जीवन में वेदान्त का अनुप्रयोग

Lectures from Colombo to Almora

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64

वेदान्तवाद

Lectures from Colombo to Almora

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65

सिद्धान्त और व्यवहार में वैदिक शिक्षा

Lectures from Colombo to Almora

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66

मैंने क्या सीखा?

Lectures from Colombo to Almora

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67

प्रतीकों और मूर्तियों की उपासना

Bhakti-Yoga

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इस खंड के प्रमुख उद्धरण

“वही जीवित हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं, शेष तो जीवित रहते हुए भी मृतक के समान हैं।”

“जिस क्षण मैंने अनुभव किया कि ईश्वर प्रत्येक मानव शरीर के मन्दिर में विराजमान है, जिस क्षण मैं प्रत्येक मनुष्य के सम्मुख श्रद्धापूर्वक खड़ा होकर उसमें ईश्वर के दर्शन करता हूँ — उसी क्षण मैं बन्धन से मुक्त हो जाता हूँ, जो कुछ भी बाँधता है वह विलीन हो जाता है, और मैं स्वतन्त्र हो जाता हूँ।”

“किसी की प्रतीक्षा मत करो, किसी वस्तु की प्रतीक्षा मत करो। जो कुछ कर सको वह करो, किसी पर अपनी आशा मत रखो।”

69

अध्याय

182,960

शब्द

732

मिनट पठन

6

खंड